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कद्दू (पेठा) की खेती से कमाए लाखो रु प्रति महिना ऐसे होती है पेठा की खेती

कद्दू (पेठा) की खेती : किसान मित्रों, पेठा की खेती किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है। इसकी बाजार कीमत 10 से 40 रुपये प्रति किलो तक है. इसका वजन अधिक होने के कारण इसकी खेती फायदे का सौदा है। बाजार में इसकी कई वैरायटी उपलब्ध हैं। इस पोस्ट के माध्यम से हम पेठे के बारे में बीज से लेकर कटाई तक सब कुछ जानेंगे।

दोस्तों पेठे की खेती सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में की जाती है। इसके अलावा इसकी खेती राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश में भी की जाती है। इसे हर जगह अलग-अलग नाम से जाना जाता है। उत्तर प्रदेश में इसे कूष्माण्ड, भतुआ कोहड़ा के नाम से जाना जाता है।

कद्दू (पेठा) की उन्नत किस्म

पेठे की सबसे लोकप्रिय किस्में येलो स्टेटनेप, गोल्डन कस्टर्ड, कल्याणपुर कद्दू 1, उनबली, पेटी पान, सूर्यमुखी, हरका चंदन, पूसा हाइब्रिड-1, काशी हरित, पूसा विश्वास, सीएस14, सीओ-1, सर्वोत्तम किस्में हैं।

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इसकी बुआई का समय सितम्बर से अक्टूबर और फरवरी से मार्च तथा जून और जुलाई है। पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी बुआई मार्च से अप्रैल माह में करनी चाहिए। जबकि नदी वाले क्षेत्रों में इसे नवंबर से दिसंबर के महीने में करना चाहिए. एक हेक्टेयर के लिए 5 से 8 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है.

कद्दू (पेठा) की खेती के लिए खेत की तयारी –

पेठा की खेती के लिए दोमट और रेतीली मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. इसकी बुआई से पहले खेत की मिट्टी पाटा से अच्छी तरह जुताई कर लें. इसके बाद 2 या 3 जुताई कल्टीवेटर या हैरो से करें. इसके बाद इसे पाटा लगाकर छोड़ दें।

एक हेक्टेयर में 20 से 30 टन गोबर की खाद डालें. अगर आप देशी तरीके से खेती करना चाहते हैं तो 20 किलो नीम की खली, 30 किलो अरंडी की खली को अच्छी तरह मिला लें. अगर आप रासायनिक खेती करना चाहते हैं तो 100 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट, 50 किलो यूरिया और 40 किलो पोटाश मिलाएं. इन सबको मिलाकर खेत तैयार करें.

सिंचाई प्रबंधन
पेठे की फसल को 10 से 15 दिन में सिंचाई की आवश्यकता होती है। लेकिन खरीफ की बुआई में बारिश के कारण सिंचाई की उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती.

कद्दू (पेठा) की फसल में कीट और रोग

पेठे की फसल में सबसे अधिक फल मक्खी का प्रकोप होता है, जिससे फल अन्दर से खराब हो जाता है। यह मक्खी फूल बनते समय उसमें अंडे देती है। धीरे-धीरे इसकी लट फल को अंदर से खराब कर देती है। इसकी रोकथाम के लिए डेल्टामेथ्रिन 11% ईसी या कार्बानिल 10% का प्रयोग कर इसकी रोकथाम की जा सकती है।

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अन्य कीटों की बात करें तो एस. फसल को सबसे अधिक प्रभावित करता है। व्हाइटगारब (गोज़ो ब्रेडेड)। इसकी रोकथाम के लिए बुआई के समय इमिडाक्लोरोपिड 40% तथा फिफ्रोनिल 40% का प्रयोग करें ताकि आपकी फसल सुरक्षित रह सके।

सफेद चूर्णी फफूंदी, डाउनी फफूंदी भी इसकी फसल को प्रभावित करती है। एस रोग के कारण पत्तियों एवं तने पर सफेद गोलाकार धब्बे बन जाते हैं। जिसके कारण पत्तियां भूरे रंग की होने लगती हैं.

मोज़ेक रोग के कारण पत्तियाँ मुड़ने लगती हैं और पौधों पर फूल आना बंद हो जाता है। एस रोग के कारण फल का आकार बहुत छोटा हो जाता है. एन्थ्रेक्नोज के कारण फलों एवं पत्तियों पर लाल एवं काले धब्बे दिखाई देने लगते हैं। एस रोग से बचाव के लिए बीज को उपचारित करके बोना चाहिए. मोजेक एवं फंगस जैसे रोगों की रोकथाम के लिए कार्बेडिज्म एवं मैंकोजेब का प्रयोग करना चाहिए।

फसल कि कटाई एवं अन्य जानकारी –

पेठे की फसल बुआई के 90 से 120 दिन में कटाई के लिए तैयार हो जाती है. कटाई से पहले यह देख लेना चाहिए कि फलों पर सफेद परत बन गयी है। आप इसे कटाई के बाद स्टॉक में भी ले सकते हैं। उचित दाम मिलने पर आप इसे बेच सकते हैं. इसकी प्रति हेक्टेयर उपज 200 से 350 क्विंटल तक होती है. बाजार में कीमत 800 रुपये से लेकर 4000 रुपये प्रति क्विंटल तक है. बाजार मूल्य आपकी फसल की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

कद्दू (पेठा) की खेती : किसान मित्रों आपको पेठा की खेती की जानकारी कैसी लगी कृपया कमेंट करके जरूर बताएं। हमारा प्रयास है कि किसानों को फसल के बारे में सही जानकारी उपलब्ध करायी जा सके।